जाकी है उपासना, ताहीकी वासना

Vyas Vani — श्री हरिराम व्यास

Verse 95 of 139

(राग रामकली) तेई रसिक अनन्य जानिवै। जिनकौ विषय-विकार न, हरिसौं रति, तेई साधु मानिवै॥ [1] तिनकी संगति पतित सु उध्दरै, जौ वारक घर आनिवे। तिनके चरनोदकसौं अपनैं, नख-शिख गातिन सानिवै॥ [2] तिनकी पावन जूठनि जैंवत, तबहीं हरि हिय आनिवै। तिनके वचन श्रवन सुनि तिहिं छिन, मन-संदेह भानिवै॥ [3] तिनकी जीवनि-धन वृंदावन, जीवत मरत बखानिवै। व्यास राधिका-रवन भवन बिनु, तेई क्यौं पहिचानिवै॥ [4] - श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, पूर्वार्द्ध (178) (राग रामकली) बिन्दे रसिक अन्य जानिवै। जिनमें इन्द्रिय विकार नहीं, हरिसौं रति, त्या साधु मनिवै। [1] पापियों की संगति सु उधरै, घर में जो काम होय। तिनकों के पाँव अलग हैं, कीलें गगन में घूम रही हैं। [2] जैन धर्म में तिनका वायु एकत्रित करता है, इसलिये वह हरि है। तुम सुनो, आनंद से भरे हृदय से सुनो। [3] वृन्दावन, तुम्हारा जीवन ही धन है, मैं तुम्हें अपने जीवन के बारे में बताऊँ। व्यास राधिका-रावण भवन बिनु, टाई क्यों पहिचनिवै.. [4] - श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, पूर्वार्ध (178)
कहाँ हौं वृंदावन तजि जाउँजाकी है उपासना, ताहीकी वासना