जाकी है उपासना, ताहीकी वासना
Vyas Vani — श्री हरिराम व्यास
Verse 96 of 139
(राग रामकली)
जाकी है उपासना, ताहीकी वासना, ताहीकौ नाम, रूपलीला गुन गाइये। [1]
यहै अनन्य परम धर्म परिपाटी, वृंदावन बसि अनत न जाइये॥ [2]
सोई विभिचारी आन कहै, आन करै, ताकौ मुख देखे, दारुन दुख पाइयै। [3]
व्यास होइ उपहास त्रास कियें, आस-अछत, कित दास कहाइयै॥ [4]
- श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, पूर्वार्ध (179)
(राग रामकली) जाकी है उपासना, तहिकी वासना, तहिकौ नाम, रूपलीला गुन संग। [1] यह दूसरा परम धर्म है, सदा वृन्दावन बसता है। [2] सो व्यभिचारी न तो कुछ कहता है, न कुछ करता है, और जब तुम उसके मुख की ओर देखते हो, तो उसे बड़ा दु:ख होता है। [3] व्यास होई उपहस त्रस के, अस-अच्छत, कित तेन कहै.. [4] - श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, पूर्वार्ध (179)