कहाँ हौं वृंदावन तजि जाउँ

Vyas Vani — श्री हरिराम व्यास

Verse 97 of 139

(राग सारंग) दुविधा तब जैहै या मनकी। निर्भय ह्वै कैं जब सेवहुगे, रज श्रीवृंदावन की॥ [1] कामरि लै करवा जब लैहे, शीतल छाँह कुंजन की। अति उदार लीला गावहुगे, मोहन स्याम सुधन की॥ [2] इन पाँइनि परिकरमा दैहै, मथुरा गोवर्द्धन की। व्यास दास जब टेक पकरिहै ऐसे पावन पनकी॥ [3] - श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, पूर्वार्ध (224) (राग सारंगा) तब एक दुविधा उत्पन्न होती है। जब मैं श्रीवृन्दावन के राज्य की सेवा करता हूँ तो मैं निर्भय कैसे हो सकता हूँ? [1] जब कमर सजती है तो कुण्डलों की शीतल छाया मिलती है। अति उदार लीला गावहुगे, मोहन स्याम सुधन। [2] पाणिनी परिक्रमा दैहाई, गोवर्धन की मथुरा। व्यास दास जब तक देवदूत है, ऐसी हवा चलती है.. [3] - श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, पूर्वार्ध (224)
जाकी है उपासना, ताहीकी वासनाकिशोरी मोहि अपनी कर लीजै