किशोरी मोहि अपनी कर लीजै

Vyas Vani — श्री हरिराम व्यास

Verse 98 of 139

(राग गौरी - अठताल) कहा भयौ वृंदावनहि बसै। जौलगि व्यापत माया तौलगि कह घरतें निकसै॥ [1] धन मेवा कौ मंदिर सेवत, करत कोठरी विषे रसै। कोटि कोटि दंडवत करै कह, भूमि लिलाट घसै॥ [2] मुँह मीठे, मन सीठे कपटी, वचन रचन नैननि विहसै। मंत्र ठगोरी कबहूँ न तंत्र गद, मानत विषय डसै॥ [3] कंचन हाथ न छुवत कमंड़ल, मै मिलाय विलसै। व्यास लोभ रति हरि हरिदासनि, परमारथहि खसै॥ [4] - श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, पूर्वार्ध (262) (राग गौरी - अट्ठला) कह भयौ वृन्दावनहि बसे। जौलगि व्यापत माया तौलगि कहा घरतेन निकसाई..[1] जो व्यक्ति धन कमाता है और मंदिर की सेवा करता है उसके कमरे में एक विशेष रसोईघर होता है। लाखों लोग सिर झुकाकर कहते हैं, 'भूमि लीलत है'.. [2] मधुर मुख, कपटी हृदय और भयभीत आँखों से रचित शब्द। मंतर ठगोरी कबहुं न तंत्र गाड़, मनत विषय दसाई.. [3] कंचन हाथ न छुवत कमंडल, माई मिलय विलासै। व्यास लोभा रति हरि हरिदासनि, परमार्थहि खाती। [4] - श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, पूर्वार्ध (262)
कहाँ हौं वृंदावन तजि जाउँललनकी बतियाँ चोज सनी