लड़ैती के खंजन लोचना
Yugal Shataka — श्री भट्ट देवाचार्य
Verse 12 of 29
(राग चर्चरी, तीनताल)
लड़ैती के खंजन लोचना।
बिनहीं अंजन दिये बिहारी, बिरह विथा उर मोचना॥ [1]
चपल चाल लालै अवलोकत, रूप लुभाय संकोचना।
जै श्रीभट्ट सुघर सुधीर स्याम कौ, करत निरन्तर रोचना॥ [2]
- श्री भट्ट देवाचार्य, युगल शतक (63)
(राग चरचरी, तीनताल) लड़ैती के खंजन लोचना। बिन पराया दीया बिहारी, विरह मुक्ति सहित..[1] चपल, गतिमान, अवलोकन करने वाला, मनोरम सौंदर्य। जय श्री भट्ट सुघर सुधीर स्याम कौ, करत निरंतर रोचना.. [2] - श्री भट्ट देवाचार्य, दोहरा शतक (63)