ब्रज भूमि मोहिनी मैं जानि
Yugal Shataka — श्री भट्ट देवाचार्य
Verse 21 of 29
(राग सारंग)
सेऊँ श्री वृंदाविपिन विलास,
जहां जुगल मिली मंगल मूरति, करत निरंतर बास।
प्रेम-प्रवाह रसिक जन प्यारे, कबहुँ न छाँडत पास।
कहाँ भाग की जय श्री भट्ट, राधा कृष्ण रस चास।
- श्री भट्ट देवाचार्य, युगल शतक (10)
(राग सारंग) स्यूं श्री वृंदाविपिन विलास, जहां जुगल मिलि मंगल मुराति, करत निरंतर बस। प्रेम की धारा प्यारे जनो, छंद कब ख़त्म होगा? जय श्री भट्ट, राधा कृष्ण रस चास, कहाँ भाग गये? - श्री भट्ट देवाचार्य, युगल शतायु (10) मुख्य रूप से प्रतिदिन श्री वृन्दावन धाम की सेवा करते रहें। जहां मंगलमूर्ति श्री श्यामा श्याम नित्य विराजते हैं और जहां प्रेम की धारा में रुचि रखने वाले लोग स्वप्न में भी इस स्थान को नहीं छोड़ते। ऐसे प्रेमी आत्माओं के भाग्य के बारे में क्या कहा जा सकता है जो हमें प्रतिदिन वृन्दावन में निवास कराते हैं और राधा-कृष्ण की जोड़ी को रास का आनंद देते हैं।