श्री वृन्दाविपिनेस्वरी रस सिन्धु बिहारी

Yugal Shataka — श्री भट्ट देवाचार्य

Verse 24 of 29

(दोहा) प्यारी प्रीतम परस्पर, रच्यौ अंग अनुराग। अधर सुधा रस देत हैं, लेत स्याम बड़भाग॥ (पद) [इकताल, राग-विहागरौ] श्री वृन्दाविपिनेस्वरी रस सिन्धु बिहारी। रच्यौ परस्पर प्रेम छेम, बाढ्यौ अति भारी॥ [1] अरप्यौ पिय हिय पाय कैं, निज अधर सुधारी। श्रीभट बड़भागी गोपाल, पीयौ रुचिकारी॥ [2] - श्री भट्ट देवाचार्य, युगल शतक (77) (दोहा) श्रीप्रिया-प्रियतम परस्पर प्रेम-रस की माधुरी में सराबोर दृष्टिगोचर हो रहे हैं; उनके हृदयों में अनुराग का अगाध सिन्धु उमड़ रहा है। श्रीप्रियाजी के मुख-कमल के मकरन्द का पान कर सौभाग्यशाली श्रीलालजी का मन-रूपी भ्रमर पूर्णतः मत्त हो उठा है। (पद) श्रीभट्टजी कहते हैं- वृन्दाविपिनेश्वरी श्रीप्रियाजी तथा वृन्दावनविहारी श्रीलालजी - ये दोनों रस के सार-समुद्र हैं। कुञ्ज-शैया पर पारस्परिक प्रेम-रस-मुद्रा में लीन श्रीप्रियाप्रियतम के हृदय में मानो आनन्द का समुद्र उमड़ पड़ता है- उनका सर्वांग आनन्द से भर उठता है। [1] अरी सखी ! इस प्रेम की रेल में श्रीलालजी के मन में जो अधरामृत पान की उत्कंठा जागृत हुई उसे देख परम कृपालु श्रीप्रियाजी ने निज-अधर-सुधारस का अर्पण कर दिया। श्रीभट्टजी कहते हैं
राधामाधव अद्भुत जोरीराधामाधव अद्भुत जोरी