मदनगुपाल सरन तेरी आयौ

Yugal Shataka — श्री भट्ट देवाचार्य

Verse 9 of 29

(राग गौरी) जाकौ मन वृन्दाविपिन हर्यौ । स्यामा-स्याम सरूप सरोवर, परि स्वारथ विसर्यौ॥ [1] निरषि निकुंज-पुंज छबि राधे, कृष्ण नाम उर धर्यौ। जै श्रीभट राधे रसिकराय, ताहि सर्बस दै निवर्यौ॥ [2] - श्री भट्ट देवाचार्य, युगल शतक (2) (राग गौरी) जाकौ मन वृन्दाविपिन हरयौ। स्याम-स्याम सरूप सरोवर, परि स्वरथ विश्रामौ।।[1] नृषि निकुंज-पुंज छवि राधे, कृष्ण नाम धरयौ। जय श्री भट्ट राधे रसिकराय, ताहि सरबस दै निवारयु। [2] - श्री भट्ट देवाचार्य, युगल शतक (2) जिन दम्पत्तियों का मन श्री वृन्दावन धाम रूपी आनंदघन ने मोहित कर लिया है, वे स्वाभाविक रूप से अपनी सुध-बुध भूलकर श्री श्यामा श्याम रूपी रस के सागर में डूब जाते हैं। [1]
राधामाधव अद्भुत जोरीराधामाधव अद्भुत जोरी