रसमय धाम सृष्टि
Yugal Sneh Patrika — श्री चाचा हित वृंदावनदास
Verse 3 of 5
देखा देखी रसिक न ह्वैहैं, यह मारग है बंका। [1]
कहा सिंह की सरवर करिहै, गीदड़ फिरै जो रंका॥ [2]
असहन निन्दा करत पराई, कबहुँ न मानी शंका। [3]
वृन्दावन हित रूप अनन्य रसिक जिन दीन्ह पथ को डंका॥ [4]
- श्री हित वृंदावन दास जी, युगल स्नेह पत्रिका (111)
देखो, मुझे कोई दिलचस्पी नहीं है, यह मौत है, बांका। [1] तुम कहाँ शेरों की पूजा करते हो, कहाँ गीदड़ फिरते हैं... [2] तुम कहाँ परायों की निंदा करते हो, तुम्हें कोई संदेह क्यों नहीं होता? [3] वृन्दावन हित रूप अन्य रसिक जिन दीन्ह पथ को डंका.. [4] - श्री हित वृन्दावन दास जी, युगल स्नेह पत्रिका (111)