धन्य श्री यमुने निधि देनहारी

छीतस्वामी

Pada 12

धन्य श्री यमुने निधि देनहारी । करत गुणगान अज्ञान अध दूरि करि, जाय मिलवत पिय प्राणप्यारी ॥१॥ जिन कोउ सन्देह करो बात चित्त में धरो, पुष्टिपथ अनुसरो सुखजु कारी । प्रेम के पुंज में रासरस कुंज में, ताही राखत रसरंग भारी ॥२॥ श्री यमुने अरु प्राणपति प्राण अरु प्राणसुत, चहुजन जीव पर दया विचारी । छीतस्वामी गिरिधरन श्री विट्ठल प्रीत के लिये अब संग धारी ॥३॥
गुण अपार मुख एक कहाँ लों कहियेजा मुख तें श्री यमुने यह नाम आवे