जगत प्रीति करि देखी
Ashtadash Pada —
Verse 12 of 16
(राग कल्याण)
लोग तो भूलैं भलैं भूलैं तुम जिनी भूलौ मालाधारी। [1]
अपनौं पति छांडि औरनि सौं रति ज्यों दारनि में दारी॥ [2]
स्याम कहत ते जीव मोते विमुख भए जिन दूसरि करि डारी। [3]
कहिं श्री हरीदास जग्य देवता ,पितरनि कौं श्रद्धा भारी॥ [4]
- श्री स्वामी हरिदास, अष्टादश पद (16)
(राग कल्याण) लोग भुलक्कड़ हैं, तुम भुलक्कड़ हो, तुम हो जो माला भूलते हो। [1] मेरे पति, चंडी औरानी, रति की बात सुनकर भयभीत लग रहे थे.. [2] सियाम का कहना है कि जो प्राणी अलग-थलग हैं वे दूसरों के साथ भी ऐसा ही करेंगे। [3] कहिन श्री हरिदास जग्य देवता, पटरानी कौन श्रद्धा भारी.. [4] - श्री स्वामी हरिदास, अष्टादश पाद (16)