हरि के नाम कों आलस कत करत है रे
Ashtadash Pada —
Verse 13 of 16
(राग आसावरी)
मन लगाय प्रीति कीजै, कर करवा सौं ब्रज-बीथिन दीजै सोहनी। [1]
वृन्दावन सौं, बन-उपवन सौं, गुंज-माल हाथ पोहनी॥ [2]
गो गो-सुतनि सौं, मृगी मृग-सुतनि सौं, और तन नैंकु न जोहनी। [3]
श्रीहरिदास के स्वामी स्यामा-कुंजबिहारी सौं चित, ज्यौं सिर पर दोहनी॥ [4]
- ललिता अवतार श्री हरिदास जी, अष्टादश पद (12)
(राग असावरी) मेरा तुमसे प्यार करने का मन कर रहा है, कर लो, मुझे दे दो, सोहनी। [1] वृन्दावन सौं, बाण-उपवन सौं, गुंजा-माल हाथ पोहनि.. [2] गो गो-सुतानि सौं, मृगी मृग-सुतानि सौं, और तन नैनकु न जोहनि। [3] श्री हरिदास के भगवान श्यामा-कुंजबिहारी सिर पर करधनी धारण करने वाले सैकड़ों सिरों वाले पुरुष के समान हैं.. [4] - ललिता अवतार श्री हरिदास जी, अष्टादश पाद (12)