प्रेम-समुद्र रूप-रस गहरे, कैसैं लागैं घाट

Ashtadash Pada —

Verse 14 of 16

(राग कल्यान) प्रेम-समुद्र रूप-रस गहरे, कैसैं लागैं घाट। [1] बेकारयौं दै जान कहावत, जानिपन्यौं की कहा परी बाट? [2] काहू कौ सर सूधौ न परै, मारत गाल गली-गली हाट। [3] कहिं श्रीहरिदास जानि ठाकुर-बिहारी तकत ओट पाट॥ [4] - ललिता अवतार श्री हरिदास जी, अष्टादश पद (18) (राग कल्याण) प्रेम तो सौंदर्य का सागर है, कैसे पाओगे घाट? [1] बेकरायूं दाई जन कवत, जानीपनायूं की परी कथा कहां है? [2] किससे कहूं जनाब, गैरों को न समझोगे तो गली-गली जा नहीं पाओगे। [3] कहिन श्री हरिदास जानी ठाकुर-बिहारी ताकत ओट पाट.. [4] - ललिता अवतार श्री हरिदास जी, अष्टादश पद (18)
हरि के नाम कों आलस कत करत है रेहरि के नाम कों आलस कत करत है रे