हरि के नाम कों आलस कत करत है रे

Ashtadash Pada —

Verse 15 of 16

(राग आसावरी) संसार समुद्र मनुष्य मीन नक्र मगर और जीब बहु बंदसि। [1] मन बयार प्रेरे स्नेह फंद फंदसि॥ [2] लोभ पिंजरा लोभी मरजिया पदारथ चारि खंद खंदसि। [3] कहि श्री हरिदास तेई जीव पार भये जे गहि रहे चरन आनन्द नन्दसि॥ [4] - ललिता अवतार श्री हरिदास जी, अष्टादश पद (9) (राग असावरी) संसार समुद्र मानुष मिन नकारा मगर और जिब बहु बंदसी। [1] मन बयार प्रीरे सनेह फांद फांडसी.. [2] लोभ पिंजरा लोभ मरजिया पदारथ चारि खंड खांडसी। [3] जहाँ श्री हरिदास के बन्धे जीव डरे, वहाँ आनन्द नन्दसी चरण गहिरे। [4] - ललिता अवतार श्री हरिदास जी, अष्टादश पाद (9)
प्रेम-समुद्र रूप-रस गहरे, कैसैं लागैं घाटतिनुका ज्यौं बयार के बस