चस्मा नित्य बिहार कौ, दियौ बिहारिनि मोहि
Bhagwat Rasik Vani — श्री भगवत रसिक
Verse 100 of 135
इष्ट धर्म, मन मत मिलै, रहनी गहनि स्वभाव।
भगवत ऐसे भक्त सौं, मिलत बढे चित चाव॥
- श्री भगवत रसिक, भगवत रसिक की वाणी, अनन्य निश्चयात्मक ग्रंथ [पूर्वार्ध] (18)
मन में वांछित धर्म न पाए, सघन प्रकृति जीवित रहे। ऐसे भागवत भक्तों से मिलने की इच्छा बढ़ जाती है.. - श्री भागवत रसिक, भागवत रसिक की वाणी, अन्य निश्चयात्मक ग्रंथ [पूर्वार्ध] (18)