चस्मा नित्य बिहार कौ, दियौ बिहारिनि मोहि

Bhagwat Rasik Vani — श्री भगवत रसिक

Verse 105 of 135

जप, तप, तीरथ, दान, ब्रत, जोग, जज्ञ, आचार। भगवत भक्ति अनन्य बिन जीब भ्रमत संसार॥ - श्री भगवत रसिक, भगवत रसिक की वाणी, अनन्य निश्चयात्मक ग्रंथ [पूर्वार्ध] (17) जप, नाल, तीरथ, दान, ब्रत, जोग, जज्नी, आचार। भगवान की भक्ति, जिब रहित संसार, माया संसार.. - श्री भागवत रसिक, भागवत रसिक की वाणी, अन्य निश्चयात्मक ग्रंथ [पूर्वार्द्ध] (17)
आज तो छबीली राधे रसभरी डोलहींजासौं सपरस चाहिए