आज तो छबीली राधे रसभरी डोलहीं

Bhagwat Rasik Vani — श्री भगवत रसिक

Verse 107 of 135

जयति रस मूर री, सुरभि सुर भूर री, भगवत रसिक जन प्राण साधा॥ - श्री भगवत रसिक, श्री भगवत रसिक की वाणी, अनन्य निश्चयात्मक ग्रंथ [पूर्वार्ध] (37) जयति रस मुर री, सुरभि सुर भूर री, भगवत रसिक जन प्राण साध.. - श्री भागवत रसिक, श्री भागवत रसिक की वाणी, अन्य निश्चयात्मक ग्रंथ [पूर्वार्द्ध] (37)
जासौं सपरस चाहिएजयति नव नागरी, रूप गुन आगरी