चस्मा नित्य बिहार कौ, दियौ बिहारिनि मोहि
Bhagwat Rasik Vani — श्री भगवत रसिक
Verse 115 of 135
लात हनी भृगु हृदय में, हरि कीन्हीं सनमान।
अम्बरीष अपराध सुनि, भगवत मूंदे कान॥
- श्री भगवत रसिक, भगवत रसिक की वाणी, अनन्य निश्चयात्मक ग्रंथ [पूर्वार्ध] (19)
लट हानि भृगु हृदय पुरुष हरि को मत मानो। अंबरीश कृपा सुनि, भगवत मुंडे कण.. - श्री भागवत रसिक, भागवत रसिक की वाणी, अन्य निश्चित ग्रंथ [प्रथम भाग] (19)