चस्मा नित्य बिहार कौ, दियौ बिहारिनि मोहि

Bhagwat Rasik Vani — श्री भगवत रसिक

Verse 12 of 135

हमारी जीवनि जुगलकिशोर। कुंजबिहारिनि कुंजबिहारी, नित नव जीवन जोर॥ भूल न जाउँ पलक कहुँ, इत उत, रहौं निरंतर पासा। दंपति संपति दिन दुलराऊँ, और न दूजी आसा॥ रूपमाधुरी, दृगन पियाऊँ, स्रवन रसीली बानी। अंग संग, उद्गार नासिका, तीनौं ताप सिरानी॥ असन करौं उच्छिष्ट दुहुँन कौ, भूसन बसन उतारे। भगवत रसिक मनाय लाडिली, करौं लाल दृग तारे॥ - श्री भगवत रसिक जी, भगवत रसिक की वाणी, अनन्यरसीकाभरण ग्रन्थ (5.5) हमारी जीवनी जुगल किशोर. कुंजबिहारी कुंजबिहारी, हर नवजीवन बलवान.. जब कहूँ पलकें, 'उठने दो', मत भूलना, स्थिर रहना। दानपति स्नैपति दिन दुलारौं, और न दूजी आसा.. रूपमाधुरी, दृगन पियौं, श्रवण रसीली बानी। अंग संग, उदगार नासिका, तिनौं तप सिराणी.. असां करौं उच्छिष्ट दुहुं कौ, भूषण बसन उंडे। भगवत रसिक मान्य लाडिली, करों लाल दिग तारे.. - श्री भागवत रसिक जी, भागवत रसिक की वाणी, अनन्यरसिकभरण ग्रंथ (5.5)
चस्मा नित्य बिहार कौ, दियौ बिहारिनि मोहिकोउ सुकिया कोउ परकिया