नित मेरौ लालन नित ही लली

Bhagwat Rasik Vani — श्री भगवत रसिक

Verse 122 of 135

(राग विभास) नित मेरौ लालन नित ही लली। नित्य बिहार, नित्य वृन्दावन, नित नये कौतुक करहिं अली॥ [1] नित नयौ नेह, नित्य नयौ जोबन, नित नयौ तौल नवल नवली। नित नये स्याम होत हैं स्यामाँ, नित नई स्यामाँ स्याम छली॥ [2] नित नये बसन, नित्य आभूषन, नित नये केसन कुसुम कली। नित नये अंगराग, आलिंगन, नित नये भोजन भांति भली॥ [3] नित नये बना बनी बने दोऊ, नित नई भावै पुलिन थली। नित नई सेज बनावत भगवत, केलि बिलोकत चित न चली॥ [4] - श्री भगवत रसिक जी, भगवत रसिक की वाणी, अनन्यरसीकाभरण ग्रन्थ (2.1) (राग विभास) रोज मेरी आंखें लाल हो जाती हैं. नित्य बिहार, नित्य वृन्दावन, नित्य नये कौतुक कराहिं अली.. [1] नित्य नये नेह, नित्य नये जोबन, नित्य नये तौला नवल नवली। हर दिन एक नया सियाम है, हर दिन एक नया सियाम है, हर दिन एक गया हुआ सियाम है.. [2] हर दिन नए फूलदान हैं, हर दिन आभूषण हैं, हर दिन नई फूल कलियाँ हैं। हर नई सुंदरता, आलिंगन, हर नया भोजन समान रूप से अच्छा है.. [3] हर नै बनि बन बने दोउ, नित नै भावै पुरिन थाली। नीता नै सेज बनावत भागवत, केलि बिलोकत चित न चाली.. [4] - श्री भागवत रसिक जी, भागवत रसिक की वाणी, अनन्यरसिकभरण ग्रंथ (2.1)
पाँयन परि बिनती करैचस्मा नित्य बिहार कौ, दियौ बिहारिनि मोहि