परस्पर दोउ चकोर, दोउ चंदा
Bhagwat Rasik Vani — श्री भगवत रसिक
Verse 124 of 135
परस्पर दोउ चकोर, दोउ चंदा ।
दोउ चातक, दोउ स्वाति,दोउ घन, दोउ दामिनी अमंदा॥
दोउ अरबिंद, दोउ अलि लंपट, दोउ लोहा दोउ चुबंक ।
दोउ आसक, महबूब दोउ मिलि, जुरे जुराफा अंबक॥
दोउ मुदार, दोउ मोर, दोउ मृग, दोउ राग रस भीने ।
दोउ मनि बिसद, दोउ बर पन्नग, दोउ बारि दोउ मीने॥
भगवतरसिक बिहारिन प्यारी रसिकबिहारी प्यारे ।
दोउ मुख देखि जियत, अधरामृत पियत, होत नहि न्यारे॥
- श्री भगवत रसिक, श्री भगवत रसिक की वाणी, अनन्यनिश्चयात्म ग्रन्थ - उत्तरार्ध (6)
दो वर्ग, दो एक दूसरे को दान। दोउ चातक, दोउ स्वाति, दोउ घन, दोउ दामिनी अमांडा..दोउ अरबिंदा, दोउ अली लानपत, दोउ लोहा दोउ चुबंक। दोउ असक, मेहबूब दोउ मिलि, जुरे जुराफ़ा अनबक.. दोउ मुदार, दोउ मोर, दोउ मृग, दोउ रग रस भीने। दोउ मनि बिसाद, दोउ बर पन्नग, दोउ बारी दोउ मेरा.. भगवत्रसिक बिहारिन प्यारी रसिकाबिहारी प्यारे। दो मुख देखी जीत, अधरामृत पियत, ऐसा नहीं होता हे मित्र.. - श्री भागवत रसिक, श्री भागवत रसिक की वाणी, अनन्यनिश्चतम ग्रंथ - स्वर्गीय (6)