चस्मा नित्य बिहार कौ, दियौ बिहारिनि मोहि
Bhagwat Rasik Vani — श्री भगवत रसिक
Verse 132 of 135
सुरतरु, नागरी, नेह निधान, स्यामा सरन मैं तेरी ।
करुणाकर करुणा करि हेरौ, ढाई भरम कि ढेरी॥
- श्री भगवत रसिक, भगवत रसिक की वाणी, अनन्य निश्चयात्मक ग्रंथ [पूर्वार्ध] (36)
सुरतरू, नागरी, नेह निधान, श्यामा शरण मैं तेरी। करुणाकर करुणा करि हेरौ, ढाई भरम की ढेरी.. - श्री भागवत रसिक, भागवत रसिक की वाणी, अन्य निश्चयात्मक ग्रंथ [पूर्वार्द्ध] (36)