नहिं निर्गुन सर्गुन नहीं

Bhagwat Rasik Vani — श्री भगवत रसिक

Verse 26 of 135

जन्म मरन माया नहीं, जहँ निसि दिवस न होइ। सत चित आनंद एकरस, रूप अनुपम दोइ॥ - श्री भगवत रसिक, भगवत रसिक की वाणी, श्री नित्यविहारी जुगल ध्यान (9) जन्म और मृत्यु माया नहीं, जहाँ दिन नहीं। सत् चित आनंद एकरस, रूप अनुपम दोई.. - श्री भगवत रसिक, भगवत रसिक की वाणी, श्री नित्यविहारी जुगल ध्यान (9)
नहिं निर्गुन सर्गुन नहींनहिं निर्गुन सर्गुन नहीं