नहिं निर्गुन सर्गुन नहीं

Bhagwat Rasik Vani — श्री भगवत रसिक

Verse 27 of 135

निसबासर, तिथि-मास-रितु, जे जग के त्यौहार। ते सब देखौ भाव में, छाँड़ि जगत ब्योहार॥ - श्री भगवत रसिक जी, भगवत रसिक की वाणी, श्री नित्यविहारी जुगल ध्यान (10) निसाबासर, तिथि-माह-ऋतु, विश्व के त्यौहार। वह सब देखो हे मनुष्य, संसार का व्यवहार.. - श्री भागवत रसिक जी, भागवत रसिक वाणी, श्री नित्यविहारी जुगल ध्यान (10)
नहिं निर्गुन सर्गुन नहींचस्मा नित्य बिहार कौ, दियौ बिहारिनि मोहि