चस्मा नित्य बिहार कौ, दियौ बिहारिनि मोहि

Bhagwat Rasik Vani — श्री भगवत रसिक

Verse 28 of 135

भगवत स्यामाँ स्याम कौ, पाबक रूप बिहार। नहिं समर्थ खगराज की, करै चकोर अहार॥ करै चकोर अहार, किलकिला जलचा पावै। साहसीक मृगराज दसन तै आमिस लावै॥ ऐसैहिं रसिक अनन्य और न नागर खगवत। सैध पराई तजौ, भजौ बित माफिक भगवत॥ - श्री भगवत रसिक जी, भगवत रसिक की वाणी, अनन्यरसीकाभरण ग्रन्थ (12.11) भगवत स्यामन स्याम कौ, पाबक रूप बिहार। समर्थ खगराज नहीं, चकोर आहर खाऊंगा.. चकोर आहर खाऊंगा, मसालेदार पानी पाऊंगा. सहसिक मृगराज दासन तै आमिस लावै।।असैहिं रसिक अन्य और न नागर खगावत।। सैध परै तजौ, भजौ बित माफिक भागवत.. - श्री भागवत रसिक जी, भागवत रसिक वाणी, अनन्यरसिकभरण ग्रंथ (12.11)
नहिं निर्गुन सर्गुन नहींदोऊ कानन लगि कहैं चुंबन देहिं अँकोर