चस्मा नित्य बिहार कौ, दियौ बिहारिनि मोहि

Bhagwat Rasik Vani — श्री भगवत रसिक

Verse 4 of 135

मंगल मूरति लाडिली, मंगल मूरति लाल। [1] मंगल मूरति सहचरी, मंगलमय सब काल॥ [2] मंगलमय सब काल, अमंगल मूल नसावन। [3] मंगल मोद बिनोद, महल मंगल मन भावन॥ [4] कहैं, सुनै, अनुमोद करै, पावै बर मंगल॥ [5] - श्री भगवत रसिक जी, भगवत रसिक की वाणी, अनन्यरसीकाभरण ग्रन्थ (1.3) मंगल मुराती लाडिली, मंगल मुराती लाल। [1] कल सबके लिए अच्छा है, कल हर किसी के लिए अच्छा है.. [2] कल हर किसी के लिए अच्छा है, कल हर किसी के लिए अच्छा है। [3] मंगल मोद बिनोद, महल मंगल मन भवन.. [4] कहो, सुनो, अनुमोदन करो, मंगल की कृपा पाओ.. [5] - श्री भागवत रसिक जी, भागवत रसिक की वाणी, अनन्यरसिकभरण ग्रंथ (1.3)
जगत में पैसन ही की माँडनहिं निर्गुन सर्गुन नहीं