कोउ सुकिया कोउ परकिया

Bhagwat Rasik Vani — श्री भगवत रसिक

Verse 31 of 135

जो उपदेसै और कौं, सो नहिं मानै आप। देखौ जगत प्रबीनता, ठगे आपकौं आप॥ [1] ठगै आपकौं आप, विषै स्वारथ नहिं छूटै। परमारथ पर - हेत, बकै, पर धन कौं लूटे॥ [2] पंडित, संत महंत, गुसाईं, परमहंस जो। लोभ - ग्रसे सब लोग, नहीं भगवत सहाय जो॥ [3] - श्री भगवत रसिक, भगवत रसिक की वाणी, निर्विरोध मनरंजन (12) एपी ने दूसरों की शिक्षाओं का पालन नहीं किया। देख संसार की बुद्धि, तेरी एपी से कौन थक गया.. [1] जो तेरा भरमानेवाला, दुष्ट अपना नहीं खोता। परमारथ पर - हेत, विश्राम, परन्तु धन को कौन लूट सकता है। [2] पंडित, संत महंत, गुसाईं, परमहंस। लालची तो सभी हैं, परंतु भगवान मदद नहीं करते.. [3] - श्री भागवत रसिक, भागवत रसिक की वाणी, निर्विरोध मनोरंजन (12)
कोउ सुकिया कोउ परकियादोऊ कानन लगि कहैं चुंबन देहिं अँकोर