पाँयन परि बिनती करै
Bhagwat Rasik Vani — श्री भगवत रसिक
Verse 40 of 135
पाँयन परि बिनती करै, से रस मुख्य सिंगार।
मान छोडि मृदु बचन कहि, करुना रस निरधार॥
- श्री भगवत रसिक, भगवत रसिक की वाणी, अनन्यरसिकभरण ग्रंथ (1.8)
पनयाना परी, मुझ पर दया करो, मुझे अपने रस से सजाओ। मन को त्याग कर कोमल वचन बोलें, करुणा का सार निराधार है.. - श्री भगवत रसिक, भगवत रसिक की वाणी, अनन्यरसिकभरण ग्रंथ (1.8)