नहिं निर्गुन सर्गुन नहीं
Bhagwat Rasik Vani — श्री भगवत रसिक
Verse 5 of 135
नहिं निर्गुन, सर्गुन नहीं, नहिं नेरे नहिं दूरि।
भगवत रसिक अनन्य की, अद्भुत जीवन मूरि॥
- श्री भगवत रसिक, भगवत रसिक की वाणी, श्री नित्यविहारी जुगल ध्यान (03)
न निर्गुण, न सरगुण, न नेरे, न दूरी। दूसरों के भगवत रसिक, अद्भुत जीवन.. - श्री भगवत रसिक, भगवत रसिक की वाणी, श्री नित्यविहारी जुगल ध्यान (03)