कोउ सुकिया कोउ परकिया

Bhagwat Rasik Vani — श्री भगवत रसिक

Verse 41 of 135

(कुंडलियाँ) आँधे के सिर सम्प्रदा, नकटे कैसौ पंथ। ठगा ठगी संसार में, समुझि लगौ संग कंथ॥ [1] समुझि लगौ संग कंथ, कह्यौ जब भामिनि ऐसै। निज प्रताप बल चहैं, भलाई उभै न तैसै॥ [2] रस स्वादी कोउ मिलै, जाहि गुन दोष न बाँधे। भगवत दृष्टा होय, करौ सेवन, तजि आँधे॥ [3] - श्री भगवत रसिक, श्री भगवत रसिक की वाणी, निर्विरोध मनरंजन (19) (राशिफल) अंध सम्प्रदाय के नेता, नकाते कैसौ सम्प्रदाय। इस संकटग्रस्त संसार में, मेरे साथ गाओ.. [1] मैं तुम्हारे साथ गाऊं, कहो जब भामिनी ऐसी हो। मैं अपनी महिमा, शक्ति, अच्छाई को समान मात्रा में नहीं चाहता। [2] जहां गुण-अवगुण का कोई बंधन नहीं, वहां रस का स्वाद किसे मिलता है? ईश्वर द्रष्टा है, सात करो, तुम अंधे हो.. [3] - श्री भागवत रसिक, श्री भागवत रसिक की वाणी, निर्विरोध मनोरंजन (19)
पाँयन परि बिनती करैमाया कौं सब जग भजै