माया कौं सब जग भजै

Bhagwat Rasik Vani — श्री भगवत रसिक

Verse 42 of 135

जात जात मैं सब, सबही जात कुजात। रसिक अनन्य अजात की कहौ कौन सी जात॥ [1] कहौ कौन सी जात, सजाती मिलै सु जानै। बिमुख बिजाती देह खेह की जात बखानै॥ [2] निज स्वरूप नहिं, लखे बिबादी बात बात मैं। भगवत भक्त ने लेय, जक्त सब जात जात मैं॥ [3] - श्री भगवत रसिक, श्री भगवत रसिक की वाणी, अनन्य निश्चयात्मक ग्रंथ [उतरार्द्ध] (20) मेरी एक जाति है, सबकी एक जाति है, सबकी एक जाति है। रसिक बताओ कौन सी जाति है पराई.. [1] बता दो कौन सी जाति है पराई जात, वही पाओगे। बिमुख बिजति देह कहि जात बखानै..[2] आपके स्वरूप में नहीं, बल्कि आपके जीवन में। भगवत भक्त ने लेय, जकात सब जात जात मैं.. [3] - श्री भागवत रसिक, श्री भागवत रसिक की वाणी, अन्य निश्चित ग्रंथ [बाद में] (20)
कोउ सुकिया कोउ परकियाकोउ सुकिया कोउ परकिया