कोउ सुकिया कोउ परकिया
Bhagwat Rasik Vani — श्री भगवत रसिक
Verse 43 of 135
माँछी, माँछ माँगने, मूँसे बाँदर चोर।
काँटे, दीमक, जीविका, जागा दस दुख घोर॥ [1]
जागा दस दुख घोर, बास क्यों कीजै बन में।
असन बसन बिनु मिले, रहै ना धीरज मन में॥ [2]
भगवतरसिक अनन्य मिलन दुस्तर स्त्रुति साछी।
बिहरत स्यामा स्याम, जहँ नहिं माँछर माँछी॥ [3]
- श्री भगवत रसिक, भगवत रसिक की वाणी, निर्विरोध मनरंजन (20)
मांची, मंच मांगे, मुन्से बंदर चोर। काँटे, दीमक, जीविका, जगदास का दुःख भयानक.. [1] जगदास का दुःख भयानक, बस इसलिए जय बन पुरुषा। असन बसन मिलन बिन, नहिं धीर मन में..[2] भगवान दुस्तर स्तुति साची से दूसरी मुलाकात। बिहारत स्याम स्याम, जह नहि मंचर मांची। [3] - श्री भागवत रसिक, भागवत रसिक की आवाज़, निर्विवाद मनोरंजन (20)