आज तो छबीली राधे रसभरी डोलहीं
Bhagwat Rasik Vani — श्री भगवत रसिक
Verse 44 of 135
जाकौं दरसन इत मिलै, ताकौं दरसन उत्त।
जाकौ दरसन इत नहीं, ताकौ मिलै न उत्त॥ [1]
ताकौं मिलै न उत्त, फिरै भटकत सब ठौरनि।
मनकौ मैल न जाइ, खात घर-घर के कौरनि॥ [2]
भगवत रसिकन संग, मुकुर लौं माँजै ताकौं।
तब निज बदन दिखाय, स्याम-स्यामा कौ जाकौं॥ [3]
- श्री भगवत रसिक, श्री भगवत रसिक की वाणी, निर्विरोध मनरंजन (21)
मुझे यह दर्शन किससे प्राप्त हुआ? मुझे यह दर्शन किससे प्राप्त हुआ? न देखोगे तो न पाओगे.. [1] न देखोगे तो जहाँ-तहाँ भटकोगे। न मिलना हो तो हर घर में खाट होती है.. [2] भगवान के भक्त के साथ, झुककर सुख मांगूंगा। तब आपका अपना शरीर देखेगा कि कौन सा काला है और कौन सा सफेद है? [3] - श्री भागवत रसिक, श्री भागवत रसिक की आवाज़, निर्विवाद मनोरंजन (21)