रसिकबर रसिक रसीलौ रसिया
Bhagwat Rasik Vani — श्री भगवत रसिक
Verse 6 of 135
(राग पूर्वी)
रसिकबर रसिक रसीलौ रसिया। [1]
अंजन दै, मन रंजन कीनौं, खंजन दृग फसिया॥ [2]
करि मनुहारि भुजन भरि भेंटी, बदन चूमि हसिया। [3]
सुनि भगवत फिरी लेत बलइया, करत मदन बसिया॥ [4]
- श्री भगवत रसिक जी, अनन्यरसिकाभरण ग्रन्थ 6 (3)
(राग पूर्वी) रसिकबर रसिक रसिलौ रसिया। [1]. [3] भागवत फिर सुनो देर बलैया, करत मदन बसिया.. [4] - श्री भागवत रसिक जी, अनन्यारसिकभरण ग्रंथ 6 (3)