ग्राम-सिंह भूंस्यौ बिपिन
Bhagwat Rasik Vani — श्री भगवत रसिक
Verse 52 of 135
भगवत जन चकरी कियो, सुरति समाई डोर।
खेलत निसिदिन लाडिली, कबहु न डारत तोर॥
- श्री भगवत रसिक, भगवत रसिक की वाणी, अनन्य निश्चयात्मक ग्रंथ [पूर्वार्ध] (24)
आपने परमेश्वर के लोगों की सेवा की है, आपके पास एक सुंदर द्वार है। खेलत निसिदिन लाडिली, कभु न डरत तोर.. - श्री भागवत रसिक, भागवत रसिक की वाणी, अन्य निश्चित ग्रंथ [प्रथम भाग] (24)