चस्मा नित्य बिहार कौ, दियौ बिहारिनि मोहि

Bhagwat Rasik Vani — श्री भगवत रसिक

Verse 56 of 135

मेरे प्रानधन स्वामिनी स्याम राधे। एक रस रूप सम बैस बारिजबदन, छके रहैं प्रेम, यह नैन साधे॥ [1] करत कल केलि बिपरीत बिबि परस्पर, बिछुर नहिं जात कहुँ पलक आधे। [2] नैन की सैन बर बैन भगवतरसिक, देत सुख, लेत सहचरि अगाधे॥ [3] - श्री भगवत रसिक, भगवत रसिक की वाणी, अनन्यरसिकाभरण ग्रंथ (2.7) मेरी प्यारी स्वामिनी श्याम राधे. एक-दूसरे के बराबर है प्यारी सी नजर, प्यार की चमक बनी रहे, ये आंखें सरल रहें.. [1] हम एक-दूसरे के विपरीत पत्नियां हैं, मैं अलग नहीं होती, आधी बंद पलकों से कहती हूं। [2].
ग्राम-सिंह भूंस्यौ बिपिनग्राम-सिंह भूंस्यौ बिपिन