माया कौं सब जग भजै
Bhagwat Rasik Vani — श्री भगवत रसिक
Verse 58 of 135
(कुण्डलियाँ)
माया कौं सब जग भजै, माधौ भजै न कोइ।
जो कदापि माधौ भजै, माया चेरी होइ॥ [1]
माया चेरी होइ, रहै चरनन लपटानी।
ज्यों मलयज के संग, सहज सौरभ सुखदानी॥ [2]
भगवत रसिक अनन्य, होय सतगुरु की दाया।
माधौ सौं मन लगै, मोह मद छूटै माया॥ [3]
- श्री भगवत रसिक, श्री भगवत रसिक की वाणी, अनन्य निश्चयात्मक ग्रंथ [उतरार्द्ध] (28)
(राशिफल) माया पूजे सब संसार, माधौ पूजे न कोय। माधौ को जो भेजा, माया तो चेरी हो गई.. [1] माया तो चेरी बन गई, रह गई तो बस मेरे चरण। यथा मलयज सहज सौरभ सुखदानी..[2] भगवत रसिक एक और है, यह सतगुरु की दया है। माधौ सौं मन लागै, मोह मद छुटै माया.. [3] - श्री भागवत रसिक, श्री भागवत रसिक की वाणी, अन्य निश्चित ग्रंथ [बाद में] (28)