बलि जैहौं श्रीरसिकचारज

Bhagwat Rasik Vani — श्री भगवत रसिक

Verse 59 of 135

(राग काफी) बलि जैहौं श्रीरसिकचारज। नित्य बिहार उद्धार कियौ जिन, मथि निज हृदय सिन्धु बारज॥ भ्रम, तम, स्रम सब हरे हमारे, कर गहि सकल संभारे कारज। भगवत रसिक प्रसंसित कीने, स्यामा स्याम सहायक आरज॥ - श्री भगवत रसिक जी, भगवत रसिक की वाणी, अनन्यनिश्चयात्म ग्रन्थ - पूर्वार्द्ध (32) (राग काफ़ी) बालि जइहौं श्री रसिकचराज। तुम बिहार को रोज मथते हो, सिंधु बराज...माया, अभिमान, परिश्रम, सब हमारे हैं, हम सब अंदर का काम संभालते हैं। भगवत रसिक प्रसनित किने, स्याम स्याम सहायक अराज.. - श्री भागवत रसिक जी, भागवत रसिक वाणी, अनन्यनिश्चातम ग्रंथ - पूर्वार्ध (32)
माया कौं सब जग भजैचस्मा नित्य बिहार कौ, दियौ बिहारिनि मोहि