चस्मा नित्य बिहार कौ, दियौ बिहारिनि मोहि

Bhagwat Rasik Vani — श्री भगवत रसिक

Verse 60 of 135

जावक जुत जुग चरण लली के। [1] अद्भुत, अमल, अनूप, दिवाकर, मोहन मानस कंज कली के ॥ [2] मंजुल, मृदुल मनोहर, सुखनिधि, सुभग सिंगार निकुंज गली के। [3] सुरतरु कामधेनु, चिंतामणि, भगवत रसिक अनन्य अली के ॥ [4] - श्री भगवत रसिक, भगवत रसिक की वाणी, अनन्यनिश्चयात्म ग्रन्थ, पूर्वार्द्ध (33) बाहर महफ़िल लाली से भरी है. [1] कंज कली के अदभुत, अमल, अनुप, दिवाकर, मोहन मानस.. [2] निकुंज गली के मंजुल, मृदुल मनोहर, सुखनिधि, सुभग सिंगार। [3] सुरतरु कामधेनु, चिंतामणि, भगवत रसिक अनन्य अलि की.. [4] - श्री भागवत रसिक, भगवत रसिक की वाणी, अनन्यानिस्चतम ग्रंथ, प्रथम भाग (33)
बलि जैहौं श्रीरसिकचारजनमो नमो श्री बृंदावनचंद