जहाँ कृष्ण राधा तहाँ, जहँ राधा तहँ कृष्ण
Bhagwat Rasik Vani — श्री भगवत रसिक
Verse 7 of 135
जहाँ कृष्ण राधा तहाँ, जहँ राधा तहँ कुष्ण।
न्यारे निमिष न होत दोउ, समुझि करौ यह प्रश्न॥ [1]
समुझि करौ यह प्रश्न, दोउ घन दामिनि जैसे।
सहज सुभाइ सुतंत्र, निरंतर बिहरत तैसे॥ [2]
भगवतरसिक अनन्य, बिना कोउ जात नहीं तहँ।
दंपति संपति - सहित, मदन रस रंग भरे जहँ॥ [3]
- श्री भगवत रसिक, भगवत रसिक जी की वाणी, निर्विरोध मनरंजन (4)
जहां कृष्ण हैं, वहां राधा हैं, जहां राधा हैं, वहां कुष्ण हैं। पलक मत झपकाओ दू, इस प्रश्न को समझो.. [1] इस प्रश्न को समझो, दू घन दामिनी जैसा। सहज सुभय सुतंतर, सनत बिहारत तैसे.. [2] दूसरे, भगवान की तरह, किसी के बिना कहीं नहीं जाते। धनपति सनपति - साहित, मदन रस रंग भरे जहाँ.. [3] - श्री भगवत रसिक, भगवत रसिक जी की वाणी, निर्विरोध मनोरंजन (4)