चस्मा नित्य बिहार कौ, दियौ बिहारिनि मोहि

Bhagwat Rasik Vani — श्री भगवत रसिक

Verse 66 of 135

चेला काहू के नहीं, गुरु काहू के नहीं, सखी लड़ैती लाल की रहें, महल के माहीं॥ - श्री भगवत रसिक, भगवत रसिक की वाणी, अनन्य निश्चयात्मक ग्रंथ [उतरार्द्ध] (40) काहू के शिष्य नहीं, काहू के गुरु नहीं, सखी लड़ैती लाल के मार्ग, महल के माही.. - श्री भागवत रसिक, भागवत रसिक की वाणी, अन्य निश्चयात्मक ग्रंथ [बाद में] (40)
प्रथम दरस गोविंद रूप के प्रानपियारेमाया कौं सब जग भजै