जमुना जल विमलत जुगल किशोर

Bhagwat Rasik Vani — श्री भगवत रसिक

Verse 8 of 135

(राग हल्हैया) जमुना जल विमलत जुगल किशोर। उबटि न्हाइ पहिरि पट भूषन सजि सिंगार दुहुं ओर॥ रस भोगी रस भोगत रुचि सों हिल मिल हियो हिलोर। भगवत अधर पान अचवन लै बीरी देत मुख जोर॥ [2] - श्री भगवत रसिक, भगवत रसिक की वाणी, अनन्यरसिकाभरण ग्रंथ 3 (4) (राग हलहैया) जमुना जल विमलत जुगल किशोर। मैं नहाने, कपड़े पहनने, सजने संवरने, दूसरों को दूध पिलाने, जूस पीने, बेटे का सुख भोगने और खुश रहने से बोर हो गई हूं. भागवत बसे पान आचवन ला बीरी दित मुख जूर.. [2] - श्री भागवत रसिक, भागवत रसिक की वाणी, अनन्यारसिकभरण ग्रंथ 3 (4)
जहाँ कृष्ण राधा तहाँ, जहँ राधा तहँ कृष्णनहिं निर्गुन सर्गुन नहीं