आज तो छबीली राधे रसभरी डोलहीं

Bhagwat Rasik Vani — श्री भगवत रसिक

Verse 73 of 135

(राग जैजैवन्ती) आज तो छबीली राधे रसभरी डोलहीं। साँवरे पिया के संग, भीजी है मदन रंग, मोद की उमंग अंग गुन ग्रंथ खोलहीं॥ [1] जैसे दामिनी घन माहीं, ऐसे भामिनी तनु माहीं, लखि आपनी परछाँहीं, हँसि हंसि बोलहीं। भगवत लाल बिहारी, पाई है कहाँ बर नारी, रूप गुन वैस हमारी, करत कलोलहीं॥ [2] - श्री भगवत रसिक, भगवत रसिक की वाणी, अनन्यरसिकाभरण ग्रंथ (7.3) (राग जयजयवंती) आज छबीली राधे रसभरी डोलाहिं। सुन्दर प्रियतमा से मदन का रंग सराबोर हो गया, मन में आनंद खुल गया.. [1] जैसे पत्नी मोटी है, वैसे ही पत्नी पतली है, मेरे होठों का परीक्षण नहीं होता, मैं हंसता हूं और बोलता हूं। भगवत लाल बिहारी, पै है बर नारी, रूप गुन वैस हमारी, करत कलोलहिं.. [2] - श्री भागवत रसिक, भागवत रसिक की वाणी, अनन्यरसिकभरण ग्रंथ (7.3)
पौढे ललित लतानि तरैपाँयन परि बिनती करै