पाँयन परि बिनती करै
Bhagwat Rasik Vani — श्री भगवत रसिक
Verse 74 of 135
सुरति सुख सोये स्यामाँ स्याम।
गल भुज दिये परस्पर दोऊ, अंग अंग अभिराम॥ [1]
तन मन उरझि रहे सुरझत नहिं, जामिनि तीजे जाम।
भगवत रसिक पलोटत पाँइन सहचरि सब सुख धाम॥ [2]
- श्री भगवत रसिक जी, भगवत रसिक की वाणी, अनन्यरसीकाभरण ग्रन्थ (9.5)
सुरति सुख सोय स्याम स्याम। गल भुज दियो युगल एक साथ, अंग अंग अभिराम.. [1] तन मन बेचैन, जामिनी तीजे जाम नहीं सूरज। भगवत रसिक पलोटत पाणिन सहचरी सब सुख धाम.. [2] - श्री भागवत रसिक जी, भागवत रसिक की वाणी, अनन्यरसिकभरण ग्रंथ (9.5)