मेरी अलक लडी अलबेली

Bhagwat Rasik Vani — श्री भगवत रसिक

Verse 75 of 135

(राग मलहार) मेरी अलक लडी अलबेली। झूलति रति बिपरीत हिंडोरै, नाहु अंस भुज मेली॥ मचकत जोबन जोर परस्पर, परिरंभन पग पेली। गावत राग मलार मनोहर, भगवत रसिक सहेली॥ - श्री भगवत रसिक जी, भगवत रसिक की वाणी, अनन्यरसीकाभरण ग्रन्थ (10.4) (राग मल्हारा) मेरी अलक लड़ी अलबेली। झूलती रति विपरीत हिंडोरे, नहु अंस भुज मेलि.. मचाकत जोबन जोर संपदक, परिर्भान पग पेलि। गावत राग मलार मनोहर, भागवत रसिक सहेली.. - श्री भागवत रसिक जी, भागवत रसिक की वाणी, अनन्यरसिकभरण ग्रंथ (10.4)
पाँयन परि बिनती करैनाचत दोउ रहस में रँग-भीनैं