नाचत दोउ रहस में रँग-भीनैं
Bhagwat Rasik Vani — श्री भगवत रसिक
Verse 76 of 135
(राग केदारौ)
नाचत दोउ रहस में रँग-भीनैं।
हाव-भाव उपजत अँग-अंगन, कोक-कला मन दीनैं॥ [1]
बाजत मधुर मृदंग किंकिनी, नूपुर ताल नबीनैं।
होड़ा-होड़ी तान, तिरप-गति लेत, नहीं कोउ हीनैं॥ [2]
राका-रति, रजनीकर-आनन उदित मदन बस कीनैं।
रीझि-रीझि भगवत की स्वामिनि, लाल अंक भरि लीनैं॥ [3]
- श्री भगवत रसिक जी, भगवत रसिक की वाणी, अनन्यरसीकाभरण ग्रन्थ (11.1)
(राग केदारौ) नाचत दू रहस में रंग-भैनैं। मन उपजत आंगन-आंगन, कोका-काला मन दिनैन.. [1] बाजत मधुर मृदंग किंकिनी, नूपुर ताल नबिनैन। शरीर होदा-होदै, तिरपा-गति लेइत, नहिं कोउ हिइनैन। [2] राका-रति, रजनीकर-आनन, उदित मदन बस किनै। रिझी-रिझी भागवत की स्वामिनी, लाल अंक भारी रेखा.. [3] - श्री भागवत रसिक जी, भागवत रसिक की वाणी, अनन्यरसिकभरण ग्रंथ (11.1)