पाँयन परि बिनती करै

Bhagwat Rasik Vani — श्री भगवत रसिक

Verse 77 of 135

नव कुंज-सदन मैं आज रँगीली होरी। इत स्यामा, उत स्याम मनोहर, खेलत उमँग न थोरी॥ [1] छल-बल घात लगावत मोहन, अंग बचावत गोरी। सावधान दोउ सुघर मनोहर, अपनी-अपनी ओरी॥ [2] कोक-कला कल-केलि परस्पर, जोबन जोर किसोरी। चतुर खिलार लाड़िली लालन, तुम जिन जानौ भोरी॥ [3] हाहा करौ, परौ पायन अब, ना चलिहैं बरजोरी। भगवत रसिक उदार स्वामिनी, दैहैं सर्बसु छोरी॥ [4] - श्री भगवत रसिक जी, भगवत रसिक की वाणी, अनन्यरसीकाभरण ग्रन्थ (12.2) नव कुंज-सदन आज रंग-बिरंगा हो गया। उत स्यामा, उत स्यामा मनोहर, खेलत उमंग न थोरी.. [1] छला-बल घट लगावत मोहन, अंग बचावत गोरी। सावधान दोउ चीनी मनोहर, निज ओरि.. [2] कोका-काला-काला-केली आपसी, जोबन जोर किसोरी। चतुर खिलाड़ी, जुझारू लड़की, तुम मुझे जानती हो, भोरी.. [3] हाहा, अब करो, अब तुम बाराजोरी में नहीं चलोगे। भागवत रसिक उदार स्वामिनी, दैहें सरबसु छोरी.. [4] - श्री भागवत रसिक जी, भागवत रसिक की वाणी, अनन्यरसिकभरण ग्रंथ (12.2)
नाचत दोउ रहस में रँग-भीनैंसुरतरु कामधेनु, चिंतामणि बारि दिये देव दानी