सुरतरु कामधेनु, चिंतामणि बारि दिये देव दानी
Bhagwat Rasik Vani — श्री भगवत रसिक
Verse 78 of 135
(राग भैरो)
सुरतरु कामधेनु, चिंतामणि बारि दिये देव दानी।
अष्टसिद्धि नव निद्धि बापुरी कौर करै सनमानी॥ [1]
षड रितु बारह मास, रैन दिन, रहत एक रस सानी।
सेवत स्याम सकाम स्वामिनी स्यामाँ नेह - निधानी॥ [2]
- श्री भगवत रसिक, श्री भगवत रसिक की वाणी, अनन्यरसीकाभरण ग्रन्थ (1.20.9)
(राग भैरो) सुरतरु कामधेनु, चिंतामणि बैरी दिये देव दानी। अष्टसिद्धि नव निधि बपुरी कौर कौर सनमानी..[1] बारह मास शरद ऋतु, वर्षा दिवस, वही रस। सेवत स्याम सकाम स्वामिनी स्यामन नेह - निधानि.. [2] - श्री भागवत रसिक, श्री भागवत रसिक की वाणी, अनन्यरसिकभरण ग्रंथ (1.20.9)