नहिं निर्गुन सर्गुन नहीं
Bhagwat Rasik Vani — श्री भगवत रसिक
Verse 9 of 135
नहीं तरे पाताल के, नहीं परे गोलोक।
हृदय महाबैराट के, कियो कमल में ओक॥
- श्री भगवत रसिक, भगवत रसिक की वाणी, श्री नित्यविहारी जुगल ध्यान (04)
न पाताल के तारे, न परलोक के तारे। महाभारत का हृदय, कमल में क्यों सही.. - श्री भागवत रसिक, भागवत रसिक की वाणी, श्री नित्यविहारी जुगल ध्यान (04)