पाँयन परि बिनती करै
Bhagwat Rasik Vani — श्री भगवत रसिक
Verse 80 of 135
यह रस-रीति प्रिया-प्रियतम की, दिब्य स्वॉति-जल जैसें।
बिसयी, ज्ञानी, भक्त, उपासक, प्रापत सबकौं कैसैं॥
कदली, कमल, पपीहा, सीपी पात्र-भेद गुन तैसैं।
भगवत बीज विसमता नाहीं, भूमि भाग्य फल ऐसैं॥
- श्री भगवत रसिक जी, भगवत रसिक की वाणी, अनन्यरसीकाभरण ग्रन्थ (12.7)
यह प्रियतम के प्रेम और संस्कार जैसा है, यह जल जैसा दिव्य प्रकाश है। वह व्यापारी, ज्ञानी, भक्त, उपासक कौन है जिसने सब कुछ प्राप्त कर लिया है? कदली, कमल, पपीहा, सिपी अलग-अलग पात्र हैं। भागवत का बीज कोई आश्चर्य नहीं है, भूमि का भाग्य उसका फल है... - श्री भागवत रसिक जी, भागवत रसिक वाणी, अनन्यारसिकभरण ग्रंथ (12.7)